अचानक से नज़र एक लौ पे गयी,
जो हर गूँज के साथ मद्धिम हो रही थी |
शायद उसे अपनी अनदेखी का गुमान था
इसीलये आख़िरी सलाम अदा कर रही थी |
आज वही लौ अपने पूर्ण रूप मे
मेरे सामने बैठी,
अपनी नज़रअंदाज़ी का हिसाब माँग रही है |
जश्न की क्षणभंगूरता का पाठ पढ़ाते हुए
एक बार फिर मेरे पर नया एहसान कर रही है |