हाए रे ये दुनिया, दुविधाओं से भरी हुई ये दुनिया, दुविधा ख़तम ही नही होती| पैसे कम है तो क्या खायें? व्डा पाव या झाल मूडी?? पैसे ज़्यादा है तो कहाँ खायें? ताज मे या ओबेरोई मे? ये एक दुविधा है और ऐसी काई सारी है| हर गली नुक्कड़ पे खड़ी है सीना तान के, ऐसा लगता है पूरा शहर इनसे भरा हुआ है|
खैर ऐसे भी लोग है जिन्हे लाइफ मे कोई दुविधा नही पर हम उनमे शुमार नही करते तो उनकी बात भी नही करते| अपनी दुविधाओं मे ही मशगूल रहते है| सोचता हूँ अपनी रोज़मर्रा की दुविधायें रेकॉर्ड करना चालू कर दू जो शायद कभी पब्लिश हो जाए और मैं रातों रात अमीर बन जाउ| अब इसमे भी दुविधा है, लॅपटॉप पे लिखूं या डाइयरी मे, इंग्लीश मे लिखूं या हिन्दी मे, फर्स्ट पर्सन मे लिखूं या थर्ड पर्सन मे| इसी सब मे ख्यालों की ट्रेन निकल जाती है, हमारे बॉम्बे की लोकल की तरह, धीरे चले या आगे वाले को धक्का मार के आगे बढ़े, यही सोचने मे निकल गयी| वैसे वो भी दुविधाओं से भारी हुई ही थी, एक दो नही पर सैकड़ो| खैर वो मेरी नही तो मुझे कोई फिकर भी नही, मेरी फिकर तो तब चालू हुई जब अगली ट्रेन 30 मिनट बाद आने वाली थी और मैं एक बार फिर लेट होने वाला था| लेकिन खुशी थी कि दुविधा नही थी| अब wait तो करना ही पड़ेगा और कोई चारा नही|
सामने अख़बार का stall था और आदत से मजबूर मैं पहुँच गया वही| अख़बार के फ्रंट पेज पे भारतीय क्रिकेट टीम की हार की खबर थी| न्यूज़ रिपोर्टर की माने तो इंडियन क्रिकेट टीम का अंत ही हो गया था| मैने सोचा कुछ भी लिख देते है, वो बचारे भी दुविधा मे रहे होंगे कि आगे बढ़ कर मारे या पीछे होके| इसी चक्कर मे आउट हो गये होंगे| दुविधा है साब, बहुत दुविधा| अगले पेज पे प्रशंसको की दुविधा थी कि effigy जलाए या घर पे कालिख पोते? पूरी दुनिया मे दुविधा है, ये एक बीमारी है जो फैल रही है हर तरफ| कोई है जो सबको confuse कर रहा है, पर किसलिए? ये नही पता लेकिन कुछ तो गड़बड़ है| इतने मे आवाज़ आई "भाई साब पढ़ना है तो खरीद लो नही तो यहाँ रख के निकल लो"| मैं उसकी तरफ देखा तो पान चबाते उस चेहरे को देख के समझ गया के भैया ये No-दुविधा zone है हालाँकि मुझे दुविधा ज़रूर थी के अख़बार खरीदु या नही?