Saturday, July 20, 2013

रंगीला


पहली छींट जब सड़क पर पड़ती, तो मैं फुदकने लगती थी खुशी से,
वजह काले बादल नही थे|
सच बोलू तो मुझे कभी वो पसंद ही नही आयें, मुझे हमेशा वो हुड़दंगी लगे,
जो शोर करके डराते थे, और मैं नन्ही सी जान सहम जाती थी|
मैं तो बस रंगीले का इंतेजार करती, क्यूंकी वही था जो बारिश मे साथ खेलने को तैयार होता था|
तनकर मेरे सर पर खड़ा हो जाता, मुझे बेधड़क कदम बढ़ाने को उकसाता,
और हमसाया बनकर साथ चलता|
मेरे साथ हंसता, इठलाता और झूमता,
दोनो मिलकर अकड़ू बादल को जीब चिड़ाते, और वो बेचारा बस गरज के रह जाता|
उन काले दिनो मे रंगीला ही था जो मुझे खुश रखताअपने रंगो मे मुझे रंगाए रखता|
मेरे हिस्से का रोज़ भीगता|

मगर एक दिन बादल ने साजिश की,
अकेले से कुछ नही हुआ तो, तेज शातिर हवा को साथ ले आया|
रंगीले ने समझाया मुझे, लेकिन मेरी भी ज़िद थी,
शायद मुझे घमंड हो गया था|  
सो जा भिड़ी मैं तूफान से|
रंगीला एक पल साथ था और अगले ही पल कही दूर|
वो आख़िरी पल था जब उसके रंगों को मैने देखा,
हमेशा वाली चमक थी उनमे, मगर वो तेज झोंको मे धुँधलाती गयी|

उस रात बादल जमकर गरजा, जैसे जीत का जश्न मना रहा हो|
मैं कंबल मे पड़ी खुद को बस कोसती रही|
सुबह मन नही था उठने का, लेकिन जब खिड़की खोली,
तो सतरंगा इंद्रधनुष था मेरे सामने|
और मैं वहाँ खड़ी अपने रंगीले को नये रूप मे निहारती रही|