पहली छींट जब
सड़क पर पड़ती, तो मैं
फुदकने लगती थी
खुशी से,
वजह काले बादल
नही थे|
सच बोलू तो
मुझे कभी वो
पसंद ही नही
आयें, मुझे हमेशा
वो हुड़दंगी लगे,
जो शोर करके
डराते थे, और
मैं नन्ही सी
जान सहम जाती
थी|
मैं तो बस
रंगीले का इंतेजार
करती, क्यूंकी
वही था जो
बारिश मे साथ
खेलने को तैयार
होता था|
तनकर मेरे सर
पर खड़ा हो
जाता, मुझे बेधड़क
कदम बढ़ाने को
उकसाता,
और हमसाया बनकर साथ
चलता|
मेरे साथ हंसता,
इठलाता और झूमता,
दोनो मिलकर अकड़ू बादल
को जीब चिड़ाते,
और वो बेचारा
बस गरज के
रह जाता|
उन काले दिनो
मे रंगीला ही
था जो मुझे
खुश रखता, अपने रंगो मे
मुझे रंगाए रखता|
मेरे हिस्से का रोज़
भीगता|
मगर एक दिन
बादल ने साजिश
की,
अकेले से कुछ
नही हुआ तो,
तेज शातिर हवा को
साथ ले आया|
रंगीले ने समझाया
मुझे, लेकिन मेरी
भी ज़िद थी,
शायद मुझे घमंड
हो गया था|
सो जा भिड़ी
मैं तूफान से|
रंगीला एक पल
साथ था और
अगले ही पल
कही दूर|
वो आख़िरी पल था
जब उसके रंगों
को मैने देखा,
हमेशा वाली चमक
थी उनमे, मगर
वो तेज झोंको
मे धुँधलाती गयी|
उस रात बादल
जमकर गरजा, जैसे
जीत का जश्न
मना रहा हो|
मैं कंबल मे
पड़ी खुद को
बस कोसती रही|
सुबह मन नही
था उठने का,
लेकिन जब खिड़की
खोली,
तो सतरंगा इंद्रधनुष था
मेरे सामने|
और मैं वहाँ
खड़ी अपने रंगीले
को नये रूप मे निहारती रही|
