चार ही कदम चला था मैं
उस कोहरे के कुन्हासे में |
मजाक कर रहा था वो मेरे साथ,
अपनी बात मनवाने में लगा था |
ठंडाएँ शरीर पर उसकी बूंदों का कमाल था
या आँखों की पलकों पर जमें शीशें का,
बस एक ही परछावां नज़र आता था
और मैं चार कदम और चलता जाता था |
रस्ते का ख्याल न था, बस क़दमों की गिनती थी |
तभी दूर एक रौशनी ने आवाज़ दी |
प्यार से बुला रही थी, नखरा नहीं था |
बेसुध कदम उस ओर बढ़ गए |
बस चार ही कदम और चला था कि
कांच के टुकड़े आँखों मे चुभे,
सीलन उड़न छु हो गयी |
और गर्म हवाओं के शोर में
मैं साँसों को गिनता रहा,
नए बुलावे का इन्तेज़ार करता रहा |