चार ही कदम चला था मैं
उस कोहरे के कुन्हासे में |
मजाक कर रहा था वो मेरे साथ,
अपनी बात मनवाने में लगा था |
ठंडाएँ शरीर पर उसकी बूंदों का कमाल था
या आँखों की पलकों पर जमें शीशें का,
बस एक ही परछावां नज़र आता था
और मैं चार कदम और चलता जाता था |
रस्ते का ख्याल न था, बस क़दमों की गिनती थी |
तभी दूर एक रौशनी ने आवाज़ दी |
प्यार से बुला रही थी, नखरा नहीं था |
बेसुध कदम उस ओर बढ़ गए |
बस चार ही कदम और चला था कि
कांच के टुकड़े आँखों मे चुभे,
सीलन उड़न छु हो गयी |
और गर्म हवाओं के शोर में
मैं साँसों को गिनता रहा,
नए बुलावे का इन्तेज़ार करता रहा |
2 comments:
परछावां punjabi word aa..
Since I commented on Magie’s blog with one my brilliant pieces of poetry, so to be fair here’s another one for your blog.. 8)
“उम्मीद तो नही फिर भी उम्मीद हो
ख्वाब मे मिल जाये लेकिन वो ख्वाब न हो”
इतनी उमंग सीरत तो नहीं आज कल
फिर भी अच्छी सलाह है किसी को देने को
कि रात न हो तो
कौन इंतज़ार करेगा चाँद का
कौन पूछेगा सितारों को ?
कि फूल मुरझाएं नहीं तो
कौन देखेगा रस्ता अगली बहार का
कौन गायेगा उन् गीतों को ?
कि दिल टूटे नहीं तो
कौन दिलाएगा एहसास उस दर्द का
इश्क के अजूबे पन का
कौन लिख पायेगा बिन title की गजलों को ?
So.. does it make sense? :P .. this could might as well be the second entry to my yet-to-be-made blog :|
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