इक खारी बूँद भरे बाज़ार मे जा गिरी,
टकटकी लगाए बादल को देखती रही |
नाराज़ थी वो उंसकी नासमझी पर,
गुस्सा थी वो आसमान के रंग पर |
तभी खरीदार के कदमो ने दस्तक दी,
तेज़ झोंकों मे बदरी तितर बितर हो गई
आसमान साफ और उजला हो गया |
और खरीदार के मोल-भाव करने से पहले,
बूँद भी हवा मे गुम हो गई |