Monday, April 19, 2010

खारी बूँद

इक खारी बूँद भरे बाज़ार मे जा गिरी,
टकटकी लगाए बादल को देखती रही |
नाराज़ थी वो उंसकी नासमझी पर,
गुस्सा थी वो आसमान के रंग पर |

तभी खरीदार के कदमो ने दस्तक दी,
तेज़ झोंकों मे बदरी तितर बितर हो गई
आसमान साफ और उजला हो गया |
और खरीदार के मोल-भाव करने से पहले,
बूँद भी हवा मे गुम हो गई |

2 comments:

anonymous said...

kaise kah doon ki acchi lagi jab samajh hi nahi aayi ... phase transition chamka thoda bahut vo accha laga .. talk in person n then may be i ll be able to comment

terebina47 said...

wo boond kya thi bhai............???????????????????????????