उलझन थी हर तरफ,
वहाँ उसके चेहरे पे, यहाँ मेरे चेहरे पे |
धारें बह गयी उसकी आँखों से |
शायद उसे हल मिल गया था,
सो मेरे हिस्से का भी रो दिया |
उलझन लेकिन अभी भी थी,
इस बार हल मुझे पता था,
और शायद उसने सुन लिया |
चल दिया वो |
उसके हर बढते कदम के साथ
मेरी छाती और चौड़ी होती जाती |
मन की अराजकता शोर मे खोती जाती |
आज अखबार के पहले पेज पे था वो |
एक बार फिर वही उलझन मेरे रूबरू थी,
मैंने सुलझाया नहीं, बस मुस्कुरा दिया |