Wednesday, January 16, 2019

बगावत

गरज के साथ बूंदे पड़ने का पूरा अनुमान था| बादल गरजे, जोर जोर से, लेकिन बरसे नहीं| ऐसा लगा
जैसे चेतावनी देने आये थे| लेकिन किसको? मुझे? या मेरे बाजू वाले को? शायद सवारी ले जाने
से मना करने वाले ऑटो वाले को, या फिर सिग्नल पे पैसे मांगते भिखारी को|

मेरे हिसाब से इसकी तफ्तीश के लिए एक कमिटी बनायीं जानी चाहिए, जो इस मामले की तह
तक जाके पता लगाए के कौन है जो बादलो को उकसा रहा है? शुक्र है के आज बादलो ने खाली
चेतावनी दी है, अगर बरस जाते तो इस शहर की सड़के दो मिनट में गटर बन जाती और शाम में
घर पहुंचना एक साहसिक मिशन|

लेकिन इस छोटी सी बात के लिए कमिटी बनाना शायद जायज़ न होगा| लोग सवाल करेंगे|
आम आदमी के टैक्स का पैसा अगर इन सब बेमतलब की चीज़ो पे खर्च होगा तो जनता बगावत
कर सकती है और अराजकता का माहौल पैदा हो सकता है|
सरकारे पलट सकती है और दुनिया बदल सकती है|

मैं यह सब सोचता हुआ चला जा रहा था के पीछे से भारी भरकम आवाज़ आयी “भाई साब,
सिगरेट फ्री की नहीं है| पैसे देके जाओ|” यह पान वाले की बगावत थी मेरे खिलाफ|
मैंने दबी सी आवाज़ में सॉरी बोला और हलकी सी मुस्कान के साथ पैसे दिए|
कोई आक्रोश का सैलाब नहीं उमड़ा और मेरी सलतनत कायम रही|

Wednesday, March 2, 2016

भीड़ का मिज़ाज

भीड़ की सबसे अच्छी बात ये होती है के इसके पास एक लक्ष्य होता है, एक Common Goal| इंसान भले अच्छा हो या खराब, भीड़ इसमे कोई भेदभाव नही करती, बस एकजुट होकर लग जाती है अपना मिशन पूरा करने मे|

अब चाहे वो Sale Season मे बॅग भरके शॉपिंग करना हो या Churchgate से Borivali तक का सफ़र| Facebook पे वैचारिक श्रेष्ठता सिद्ध करना हो या आंदोलन के नाम पे अराजकता फैलाना| या फिर लंच टाइम पे ऑफीस के सामने वाली टपरी पे जाके चाय-सुत्टा पीना|

भीड़ हर जगह होती है| इसका अपना कोई भाव नही होता| ये प्रतिभागियों की भावनायो की एक गूँज होती है| अब ये गूँज जोश भी हो सकती है और खुशी भी, गुस्सा भी हो सकती है और आक्रोश भी, बदमाश भी हो सकती है और हुड़दंग भी|

कहने का मतलब है के जैसे आग उसी तरफ फैलती है जिस ओर की हवा तेज होती है - उसी प्रकार जो भाव प्रतिभागियों मे सबसे उग्र होता है, भीड़ उसी का जयकारा करती है| बाकी सब भाव बेमायने हो जाते है और उनसे जुड़ी सभी नैतिकतायें खारिज|

हरयाणा मे कोटे की माँग को लेके तोड़ फोड़ हुई तो उसी की आड़ मे बलात्कार भी| जवाबदेही किसी की नही है क्यूंकी ये भीड़ ने किया कि किसी व्यक्ति विशेष ने| Twitter पे आए दिन किसी ना किसी पत्रकार या सेलेब्रिटी को यही भीड़ डराती है| आप को पसंद नही तो ब्लॉक कर दीजिए, भीड़ नया फेक अकाउंट बनके जाएगी| Bangalore के पास Tanzania की बेकसूर लड़की के साथ बदसलूकी हुई, क्यूंकी वो भीड़ का न्याय था|

यह भीड़ का सबसे डरावना पहलू है| आप इसको क़ानून के कठघरे मे खड़ा नही कर सकते क्यूंकी इसका कोई स्वरूप नही है| यह प्रतिभागिओं की सोच और समझ का उत्पाद है जिसपर किसी का नियंत्रण नही| इसका मतलब ये नही है के भीड़ हमेशा ग़लत ही होती है| इतिहास पढ़े तो पता चलता है के कैसे भीड़ ने एक भाव के तूफान मे बहके बड़े बड़े सकारात्मक परिवर्तन कर दिए, कितनी नयी शुरुआतें और ना जाने कितने लोगों को एक नयी उम्मीद की झलक दिखाई| लेकिन जहाँ ये हुआ वही अराजकता भी आई, लोगों ने भीड़ की आड़ मे अपने पर्सनल अजेंडे भी पूरे किए|

कहते है के गेहू के साथ घुन तो पिसता ही है| लेकिन क्या गेहू के साथ घुन का पीसना सही है? हरयाणा मे महिलाओं का यौन शोषण, Twitter पे लोगो का मानसिक शोषण और Bangalore मे Tanzanian लड़की का शारीरिक शोषण सही है?

मैं रोज एक छोटी भीड़ के साथ सड़क पार करता हूँ| हरे सिगनल पे तेज़ी से आती गाड़ियाँ हमारी भीड़ के सामने बेबस होती है| अपनी कार मे बैठे "बड़े लोग" रोज गुस्सा और Best की बस का ड्राइवर आग बाबूला होता है| लेकिन भीड़ रुकती नही क्यूंकी उसे जल्दी है, मुझे जल्दी है| मैं खुश हूँ क्यूंकी ऑफीस मिनिट पहले पहुँच जाता हूँ|

लेकिन ये सोचता रहता हूँ के उस दिन क्या मैं इतना खुश होऊँगा जब यही भीड़ आगज़नी कर रही होगी अगर इसका कोई नन्हा सिपाही सड़क पे शहीद हो गया तो?

धर्म, जाती, क्षेत्र और राष्ट के नाम पे राजनीति तो चलती ही रहेगी| ये सब बड़े मुद्दे है जो सरकारे गिराते और बनाते है, लेकिन क्या हमे नही चाहिए के एक समाज के रूप मे हम आत्मनिरीक्षण करे?



Monday, March 23, 2015

इंतेज़ार

दूर धूल का गुबार उठ रहा था जो हर बीतते पल के साथ घना हो रहा था| बानो टकटकी लगाए उस गहराते जाते गुबार को देख रही थी| उसकी कमर पे चुन्नी, अधखुले बाल और हाथ मे लंबी सी दरांत थी जिसकी धार कुन्द हो गयी थी उसके चेहरे की चमक की तरह| एक हाथ से उसने अपने माथे का पसीना पोछा और गहरी साँस ली| उसकी दरांत पे पकड़ मजबूत हो गयी और आँखें कठोर, जैसे कि अंधड़ को आर-पार की चुनौती देने वाली हो| वो हिली नही बस अपनी और आते गुबार को घूर रही थी|

तभी गुबार को चीरती हुई सवारिओं से लदी जीप उसके पास से तेज़ी से निकली| सवारिओं को जल्दी थी या नही ये कहना मुश्किल है, क्यूंकी हर किसी के सफ़र का मुकाम चाहत या बंदिश से तय होता है| शायद ड्राइवर एक और चक्कर लगाने की फिराक़ मे था|

खैर जो भी था बानो के चेहरे की चमक थोड़ी और कम हो गयी थी और दरांत की पकड़ ढीली| उसने चारे का गट्ठर उठाया और घर चल दी|

Sunday, January 25, 2015

प्रदेश

झगड़ा चल रहा था रोड पे, टॅक्सी वाले और यात्री के बीच मे| हमेशा की तरह या तो कोई कम दे रहा था या कोई ज़्यादा माँग रहा था| हमेशा की तरह मैने तफ़तीश नही की के मुजरिम कौन है, चुपके से पीछे वाली टॅक्सी मे जाके बैठ गया और वो भी चुपचाप चल दिया| तेज चलते इस शहर मे किसी को क्या पड़ी फोकट मे जाके शाह जी बनने की|

हवा मे ठंड थी| ठंडे ठंडे झोंके चेहरे पे पड़ रहे थे और मैं हाथो को टॅंगो के बीच रख के सेकते हुए बाहर देख रहा था| एक एक करके रोड साइड hoardings आ रहे थे और प्यार से बुला रहे थे| खूबसूरत चेहरे discount बेच रहे थे| खुशिओ का मेला सा लगा हुआ था| एक छोटी सी EMI और जिंदगी भर की खुशी| हिन्दी फिल्म के "they happily lived ever after" की तरह| बाद की कहानी मेरी बॅंक बॅलेन्स को पता थी सो बस मेला दूर से ही देख रहा था|

"साब देखा आपने कैसे कर रहा था वो आदमी" वो काफ़ी उत्सुक होके बोला| मैं कुछ बोल पाता, उससे पहले ही वो शुरू हो गया "साब आजकल भलाई का जमाना नही रहा, 5-10 रुपये के लिए लोग चिक चिक करते है|" मुझे उसका judgement समझ नही आया| कैसे पता की यात्री ग़लत था और वो टॅक्सी वाला उसे लूट नही रहा था| "साब मेरे साथ हुआ था ऐसा, 2 लड़के आके बैठ गये टॅक्सी मे| थोड़ा ही दूर जाना था| मैं वैसे तो लंबा भाड़ा ही लेता हूँ लेकिन दोनो अपने प्रदेश के थे तो बिठा लिया|" मैने पूछा जिस शहर मे लोग बाजू वाले का नाम भी नही जानते वहाँ तुमने अपने प्रदेश वाले को कैसे बिठा लिया| वो हंसा और बोला "हाँ साब ग़लती हो गयी, थोड़ा नया हूँ ना"| मैने भी मुस्कुराया उसके साथ| वैसे ग़लती ही सिखाती है हमे, किताबे तो सिर्फ़ किस्से रटाती है|

उसने उत्सुकता जारी रखते हुए कहानी चालू रखी| "भाड़ा साब 20 रुपये हुआ और उस भाई ने 500 का नोट निकाल के दिया| मैं बोला छुट्टा देदो| अब 20 रुपये के भाड़े के लिए 500 का छुट्टा क्यूँ देता मैं| वो बोला यही है भैया, लेलो नही तो चलते बनो| तभी उसके साथ वाले ने 100 का नोट निकाला| मैने लेके जेब मे रखा और पता नही क्या मन मे आया, छुट्टा मैने 480 दे दिया| मत मारी गयी थी और वो भाई भी आगे से कुछ नही बोला| चुपचाप पैसे लेके वो अपने रस्ते और मैं अपने| थोड़ा आगे जाके पान खाने के लिए रुका तो पता चला के भैया पूरी शाम भर की कमाई तो लूटा आया|"

मैं बोला उसने कैसे नही बताया आपको के आपने ज़्यादा दे दिया है| वो बोला "साब हमारे प्रदेश मे दूसरे को बेवकूफ़ बनाने मे लोग अपनी चतुराई समझते है| छोटी सोच है ना साब, इतने मे ही खुश हो लेते है|"

मुझे समझ नही आया क्या बोलू| मैं भी उसी के प्रदेश का था लेकिन ऐसा कभी किसी के साथ नही किया| किसी का पैसा मारने मे भला क्या चतुराई? मैं ये सोच ही रहा था के उसने मेरा प्रदेश पूछ ही लिया|

ज़्यादातर थोड़ा खुश होके ही बताता हूँ गर्मजोशी के साथ, मगर आज थोड़ा संभाल के बोला| उसने सुना और फिर पूछा "जात क्या है साब आपकी?" मैं सकपका गया| इस शहर मे पहली बार किसी ने ये सवाल पूछा था मेरे से, सो थोड़ा सोच मे पड़ गया| हमारे प्रदेश मे लोग उँची जात का होने का गुरूर दिखाते है| मुझे टॅक्सी वाले की बात याद आ गयी, "छोटी सोच है और इसी मे खुश हो लेते है|"

मैं सोच मे ही था के वो बोला "क्या हुआ साब? फ़िक्र ना करो हम तो ठाकुर है|" मैं बोला के मैं सिख हूँ| वो सुना और पलट के बोला "अच्छा! पंजाबी हो आप|" और फिर थोड़ा रुक के ताना मरते हुए बोला "देखने से लगता तो नही|" मैं एक दबी सी हँसी हंसा और चुपचाप घर पहुँचने का इंतेज़ार करता रहा|