दूर धूल का गुबार उठ रहा था जो हर बीतते पल के साथ घना हो रहा था| बानो टकटकी लगाए उस गहराते जाते गुबार को देख रही थी| उसकी कमर पे चुन्नी, अधखुले बाल और हाथ मे लंबी सी दरांत थी जिसकी धार कुन्द हो गयी थी उसके चेहरे की चमक की तरह| एक हाथ से उसने अपने माथे का पसीना पोछा और गहरी साँस ली| उसकी दरांत पे पकड़ मजबूत हो गयी और आँखें कठोर, जैसे कि अंधड़ को आर-पार की चुनौती देने वाली हो| वो हिली नही बस अपनी और आते गुबार को घूर रही थी|
तभी गुबार को चीरती हुई सवारिओं से लदी जीप उसके पास से तेज़ी से निकली| सवारिओं को जल्दी थी या नही ये कहना मुश्किल है, क्यूंकी हर किसी के सफ़र का मुकाम चाहत या बंदिश से तय होता है| शायद ड्राइवर एक और चक्कर लगाने की फिराक़ मे था|
खैर जो भी था बानो के चेहरे की चमक थोड़ी और कम हो गयी थी और दरांत की पकड़ ढीली| उसने चारे का गट्ठर उठाया और घर चल दी|
No comments:
Post a Comment