Sunday, January 25, 2015

प्रदेश

झगड़ा चल रहा था रोड पे, टॅक्सी वाले और यात्री के बीच मे| हमेशा की तरह या तो कोई कम दे रहा था या कोई ज़्यादा माँग रहा था| हमेशा की तरह मैने तफ़तीश नही की के मुजरिम कौन है, चुपके से पीछे वाली टॅक्सी मे जाके बैठ गया और वो भी चुपचाप चल दिया| तेज चलते इस शहर मे किसी को क्या पड़ी फोकट मे जाके शाह जी बनने की|

हवा मे ठंड थी| ठंडे ठंडे झोंके चेहरे पे पड़ रहे थे और मैं हाथो को टॅंगो के बीच रख के सेकते हुए बाहर देख रहा था| एक एक करके रोड साइड hoardings आ रहे थे और प्यार से बुला रहे थे| खूबसूरत चेहरे discount बेच रहे थे| खुशिओ का मेला सा लगा हुआ था| एक छोटी सी EMI और जिंदगी भर की खुशी| हिन्दी फिल्म के "they happily lived ever after" की तरह| बाद की कहानी मेरी बॅंक बॅलेन्स को पता थी सो बस मेला दूर से ही देख रहा था|

"साब देखा आपने कैसे कर रहा था वो आदमी" वो काफ़ी उत्सुक होके बोला| मैं कुछ बोल पाता, उससे पहले ही वो शुरू हो गया "साब आजकल भलाई का जमाना नही रहा, 5-10 रुपये के लिए लोग चिक चिक करते है|" मुझे उसका judgement समझ नही आया| कैसे पता की यात्री ग़लत था और वो टॅक्सी वाला उसे लूट नही रहा था| "साब मेरे साथ हुआ था ऐसा, 2 लड़के आके बैठ गये टॅक्सी मे| थोड़ा ही दूर जाना था| मैं वैसे तो लंबा भाड़ा ही लेता हूँ लेकिन दोनो अपने प्रदेश के थे तो बिठा लिया|" मैने पूछा जिस शहर मे लोग बाजू वाले का नाम भी नही जानते वहाँ तुमने अपने प्रदेश वाले को कैसे बिठा लिया| वो हंसा और बोला "हाँ साब ग़लती हो गयी, थोड़ा नया हूँ ना"| मैने भी मुस्कुराया उसके साथ| वैसे ग़लती ही सिखाती है हमे, किताबे तो सिर्फ़ किस्से रटाती है|

उसने उत्सुकता जारी रखते हुए कहानी चालू रखी| "भाड़ा साब 20 रुपये हुआ और उस भाई ने 500 का नोट निकाल के दिया| मैं बोला छुट्टा देदो| अब 20 रुपये के भाड़े के लिए 500 का छुट्टा क्यूँ देता मैं| वो बोला यही है भैया, लेलो नही तो चलते बनो| तभी उसके साथ वाले ने 100 का नोट निकाला| मैने लेके जेब मे रखा और पता नही क्या मन मे आया, छुट्टा मैने 480 दे दिया| मत मारी गयी थी और वो भाई भी आगे से कुछ नही बोला| चुपचाप पैसे लेके वो अपने रस्ते और मैं अपने| थोड़ा आगे जाके पान खाने के लिए रुका तो पता चला के भैया पूरी शाम भर की कमाई तो लूटा आया|"

मैं बोला उसने कैसे नही बताया आपको के आपने ज़्यादा दे दिया है| वो बोला "साब हमारे प्रदेश मे दूसरे को बेवकूफ़ बनाने मे लोग अपनी चतुराई समझते है| छोटी सोच है ना साब, इतने मे ही खुश हो लेते है|"

मुझे समझ नही आया क्या बोलू| मैं भी उसी के प्रदेश का था लेकिन ऐसा कभी किसी के साथ नही किया| किसी का पैसा मारने मे भला क्या चतुराई? मैं ये सोच ही रहा था के उसने मेरा प्रदेश पूछ ही लिया|

ज़्यादातर थोड़ा खुश होके ही बताता हूँ गर्मजोशी के साथ, मगर आज थोड़ा संभाल के बोला| उसने सुना और फिर पूछा "जात क्या है साब आपकी?" मैं सकपका गया| इस शहर मे पहली बार किसी ने ये सवाल पूछा था मेरे से, सो थोड़ा सोच मे पड़ गया| हमारे प्रदेश मे लोग उँची जात का होने का गुरूर दिखाते है| मुझे टॅक्सी वाले की बात याद आ गयी, "छोटी सोच है और इसी मे खुश हो लेते है|"

मैं सोच मे ही था के वो बोला "क्या हुआ साब? फ़िक्र ना करो हम तो ठाकुर है|" मैं बोला के मैं सिख हूँ| वो सुना और पलट के बोला "अच्छा! पंजाबी हो आप|" और फिर थोड़ा रुक के ताना मरते हुए बोला "देखने से लगता तो नही|" मैं एक दबी सी हँसी हंसा और चुपचाप घर पहुँचने का इंतेज़ार करता रहा|

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