Sunday, September 4, 2011

हँसी का थैला

"कौन हँस रहा है?" वो बोली|
मैं सकपका गया, मैने बोला "कोई भी तो नही है|"
लेकिन वो नही मानी, लहरा कर चल दी हँसी की ओर| और मैं पीछे पीछे, उसे रोकता हुआ| हर कदम के साथ हँसी मजबूत हो रही थी और मैं विचलित हो रहा था|
हँसी की आवाज़ अलमारी में से आ रही थी जो आज मैने ग़लती से खुली छोड़ दी थी| उसने अलमारी में झाँका और हैरान होकर बोली "यहाँ तो कोई नही है, हँस कौन रहा है?" जवाब था मेरे पास, हमेशा होता है| लेकिन हिचक भी हमेशा की तरह थी| कुछ बोला नही, कोने  में पड़ी पोटली खोली और इक थैला उसके हाथों में रख दिया| वो अभी हैरान थी, शायद सोच रही थी जाने कौन सा खिलौना है इसमे जो इस बच्चें ने संभाल के रखा है|
उसने ज्योहि थैले को खोलना चाहा, मैने उसे रोक दिया और थैला लेके मेज पर रख दिया| फिर दरवाज़ा, खिड़की, पंखा सब बंद किया| मेरे चेहरे का भाव अभी भी विचलित ही था, उत्सुकता नही थी| मैं एक चोर की भाँति था, जिसकी चोरी पकड़ी गयी थी और वो शर्मिंदा था|
अब उसके सब्र का बाँध टूट रहा था और उसने पूछ ही लिया कि आख़िर माजरा क्या है? मैं मुस्कुराया और बोला,"यह है मेरा हँसी का थैला"| और धीरे से थैले की गाँठ खोलकर कमरे के कोने मे जाके बैठ गया|
पूरा कमरा हँसी से गूंजने लग गया| कोई एक ख़ास हँसी नही बल्कि तरह तरह की हँसी| कोई खिलखिलती, कोई गुनगुनाती, कोई रौब दिखाती, कोई डारी सहमी सी, कोई नकचड़ी तो कोई इठलाती| सब तरह की हँसी थी| ऐसा लगता था  कि जैसे मेरी जवानी की प्रदर्शनी लगी हुई है| हर हँसी में एक पल क़ैद था, हर एक के पास एक कहानी थी|
मगर आज कोई मेरे पास नही आई, नया श्रोता जो मिल गया था| श्रोता भी ऐसा, जो उनमे कहीं खो गया था| हर हँसी उससे जा चिपकी थी और वो सबको प्यार से अपने कानो में बिठा के उनके साथ हँस रही थी| सुनने में तो हँसी की बस एक गूँज होती है, कोई भाषा नही होती, बस एक भाव जुड़ा होता है| लेकिन उसे देखकर लग रहा था कि जैसे वो हर उस पल को जी रही है, महसूस कर रही है| खाली हँस ही नही रही बल्कि हर उस हँसी के पल को स्पष्ट देख पा रही है| हैरान था मैं, लेकिन  फिर सोचा शायद यही एक कारण है कि वो अभी इस कमरे मे है|

तभी मेरा ध्यान मेरे बगल में बैठी चुप सी हँसी पर गया| वो हमेशा की तरह चुपचाप अलग सी बैठी थी और मुझे देख रही थी| मैने उसकी ओर देखा, एक चुप सी हँसी दी और उसे अपनी जेब मे डाल लिया| वो मेरी सबसे वफ़ादार थी और मुझे उसकी वफ़ादारी पे कोई शक भी नही था, बस डर था क्योंकि आज मैं अकेला नही था और वो भी इस बात को समझ रही थी इसलिए ऐतराज़ भी नही किया|
बस एक डर और था मुझे जो कुछ ही पलों में सामने भी आ गया| इक शैतानी भारी हँसी उसके होंठों पे जा बैठी थी| उसकी हँसी ज़ बातें करने लगी जैसे कि उसको कुछ समझा रही हो| इधर मेरा डर बढ़ रहा था और उधर वो दोनो अपने मे ही मग्न थी| दोनो को हंसते देखा तो लगा कि दोनो एक दूसरे को जानती है, बस कभी मिलना नही हुआ| मुझसे यह मिलन सहा भी नही जा रहा था लेकिन रोकने का मन भी नही था| सोच रहा था कि एक तरह से अच्छा ही है, आज के बाद शायद कोई सवाल ही ना रहे जिसका जवाब देना पड़े|
मैं सोच मे ही डूबा था कि अचानक उसकी आवाज़ आई,"यह बहुत ग़लत बात है|" मैं थोड़ा और डर गया| मैं बोला क्या हुआ?
वो मुँह बनती मेरे पास आई और बोली "मुझे आज तक क्यूँ नही मिलवाया इन सब से?" मैं सोच मे पड़ गया| वैसे तो हर इंसान स्वार्थी होता है, अपने फ़ायदे की ही सोचता है| लेकिन अपने जीवन से जुड़े हँसी के पलों को थैले में छुपाने में मेरा क्या स्वार्थ छुपा था यह मुझे भी नही पता था| शायद मैं उन्हे छुपाकर दुनिया को यह जताना चाहता था कि मेरा जीवन कितना नीरस है जिससे कि मैं उनकी सहानुभूति बटोर सकूँ| या शायद मैं अपनी अलग सी दुनिया में अकेला ही रहना चाहता था| खैर जो भी था, मेरे पास इसका जवाब नही था, सो मैने बात टाल दी|  उसने भी एक नादान हँसी हसी और खिड़की के पास जाके खड़ी हो गयी| मैने उसकी ऐसी हँसी पहले कभी नही देखी थी इसलिए तुरंत उस हसी को दबोच लिया और चुपके से थैले मे डाल दिया| मेरा स्वार्थी मन नयी हँसी को पाके खुश था| लेकिन मैं ज्यूँही पलटा तो देखा कि वो मेरी इस हरकत को देख रही है| हंसते हुए बोली,"अरे हज़ूर इस हँसी को संभाल के रखने की ज़रूरत नही है, यह कहीं नही खोने वाली|" और उसने फिर से वही नादान सी हँसी हसी|
मैं कुछ बोला नही, बस उसे देखता रहा| मेरी जेब मे पड़ी चुप सी हँसी चुपके से हँस रही थी| हँसती भी क्यूँ ना? वही एक थी जो मेरे असमंजस को समझ पा रही थी|

3 comments:

daGmann said...

Well, this is more like the coming of age of a writer. Bravo. Bravo.

PJ said...

auron ko haste dekho mann
swayam haso sukh pao
apne sukh ko vistreet karlo
jag ko sukhi banao.

good work dude..nice ending!!

anonymous said...

came out brilliantly dude! हंसी के थैलों में कैद हंसी कहा से चुराते हो अल्लाह ही जाने. पर ये हंसी का थैला कहा से चुराया है ये तो या हम जानते हैं या तुम :)...मज़ा आ गया पढ़ने में मिया!