Saturday, June 21, 2014

आजादी

रात की ख़ामोशी के क्या कहने| एक दम सुनसान, दुनिया के शोर से दूर| एक दम सन्नाटा और दूर तक कोई नहीं| एक आवाज़ भी दो तोह कोई नहीं सुनेगा और न ही कोई जवाब देगा| एक दम चुप्पी| मजा आता है मुझे ऐसे इस माहौल में, पता नहीं क्यू| सोने का मन नहीं करता, बस जी चाहता है की इसी ख़ामोशी के आलम में मदहोश सा बैठा रहू| मगर ये अलर्म क्लॉक जगा देती है सुबह सुबह| आज फिर आनन् फानन में देर हो गयी| ऑफिस पहुंचा तोह मेलबॉक्स में ढेर सारे मेल थे| एक एक कर जब सबको पढ़ा तोह रात को देखा बचपन का आजादी का सपना याद आ गया| बचपन में जब चाचा नेहरु या महात्मा गांधी के बारे में पढता था तोह सोचता था गुलामी के आवेश में उन्हें कैसा लगता होगा| हर तरफ फिरंग जो बस हिंदुस्तान की सर जमीन को लूटना चाहते है, और उनमे फसे वो जो तिरंगे को लाल कीलें के परचम पर लहराने को चलते| फ़ोन की घंटी बजी तोह फिर सपना टूटा, बॉस को सब मेल का रिप्लाई आज ही चाहिए था| और फिर मुझे फिरंगो का बड़ा सा बैरिकेड नज़र आया| वैसे गाँधी जी तो  अहिसा के पुजारी थे, भले उन्हें क्या जरुरत पढ़ी लढाई झगडे में पढने की| मैंने भी यही सोचा और काम करने लगा| सत्यआग्रह था मेरा शायद, या फिर नहीं| जो भी था, सैलरी मेल का रिप्लाई करके ही आने वाली थी, सो ज्यादा सोचा नहीं| तभी भगत की आवाज़ आई लेकिन मैंने अनदेखा कर दिया| अराजकता फैलाने आया था वो मैं अच्छे से जानता था, आगे की फ़िक्र नहीं बस आज में ही जीता था वो| या फिर उसके उसूल अलग थे जो मैंने शायद कभी सोचे नही थे| खैर जो भी था मैंने उसके ख्याल्लों को दर किनार कर दिया| गांधी जी ने बोला था “वो एक चांटा मारे तुम दूसरा गाल भी आगे कर दो”| मैंने वही किया, हर मेल के दो जवाब| मगर सिलसिला रुका नहीं, चलता गया शाम तक और मैं थक कर चल दिया घर| सोच रह था की गाँधी के शब्दों में न तो ये सत्याग्रह था और न ही भगत के हिसाब से कोई आजादी की लड़ाई| गुलामी कहते हुए भी शर्म आ रही थी| बस एक जज्बा था की कल आके फिर से लड़ेंगे और मुह तोड़ जवाब देंगे| जवाब पता था की फिर सैलरी की चिंता मे उड़न छु हो जायेगा| मगर अपने आप को भरोसा दिलाने में कोई बुराई तो नहीं है की कल कुछ ऐसा करेंगे की इनकी बुनियाद ही हिल जाए| ऐसा सोच ही रहा था की शेयर्ड ऑटो में बगल में बैठी लड़की की आवाज़ कानो में आई “टीवी बंद करो पहले फिर बात करो!” मैं इक्कीसवी सदी में था अभी, जहाँ लड़की की आवाज़ से यदि टीवी ज्यादा जरुरी हो जाए तोह हाहाकार मच जाता है| उधर किसी ने टीवी का वॉल्यूम कम किया तोह इधर मैंने मन में बैठे गाँधी को म्यूट किया| सोचा भगत सही था, बहरों को सुनाने के लिए गूँज जरुरी है, नहीं तोह ये नींद से जागेंगे नहीं| इधर भगत भाई ने अपना वॉल्यूम बढाया मेरे कान में और दुसरे कान में बगल में बैठी मैडम ने भी वॉल्यूम बढ़ा दिया| शायद दोनों की वॉल्यूम में कोहेरेंस हो गया, सो मैंने भी एक जड़ दिया और मैडम ने भी एक जोरदार दिया| मैडम के भगत का तोह पता नहीं पर मेरा भगत जरुर भाग गया| मैं चुपचाप गाँधी की याद में दूसरा गाल आगे किये बैठा रहा|

रात की ख़ामोशी के क्या कहने| एक दम सुनसान, दुनिया के शोर से दूर| एक दम सन्नाटा और दूर तक कोई नहीं| ना कोई गाँधी और ना कोई भगत, सिर्फ मैं|

2 comments:

anonymous said...

Superbly written and very interesting throughout the narrative! Honestly - Awesome read!!! ��

Maanas Dwivedi said...

Chaa Gaye guru!!! Thoko taali!!!